Tuesday, February 25, 2020
मेरी जानी पहचानी गोरैय्या
फुर्र इधर फुर्र उधर उड़ कर वह इतराती ......पलक झपकते ही वह सरसराकर निकल जाती ...सूरज के उगने से पहले वह फुदक फुदक कर आती .......अपने मधुर कलरव से मुझे आहिस्ता से जगाती ....उसकी प्यारी चूँचूँ सुनकर में निद्रा से जग जाती .......मेरे आने की आहात पाकर वह तरुवर पर उड़ जाती ......फिर आँगन की मुंडेर पर बैठकर टुकुर टुकुर ताकती ...और रखी किनकी की ढेरी पर अपनी चोंच मारती ......नलके के नीचे गड्ढ़े में वह पंख फड़फड़ाकर नहाती .......और फुर्र से उड़कर अपने कपडों के तार पर सुखाती .......टुकुर टुकुर ताककर इधर उधर ......वह अपनी प्यास बुझाती .....पंछियों का टोला बनाकर वह सुदूर आकाश में उड़ जाती ......संध्या होने पर बच्चों के लिए किनके चोंचमें लाती .......नहीं सी जान बच बच कर नाज़ुक पंखों से अपने कर्तव्यनिभाति ......इस बदले हुए विशाल शहर में अपना वजूद बनाती .......अब कहाँवह मुंडेर कोने अत्रे , ताखे और झरोखे , रोशनदान .....जहाँ वह फुदक फुदक करबासाती अपना घरबार .......अब कहाँवह खोला किवाड़ .....जहाँ वह फुरफुराकर पधारे ...और कहाँ वह मुंडेर जिसपे रखी किनकों की ढ़ेरी पैर चोंच मारे ......अब तो सर्वत्र मोबाइल टावर और बिजली के तारों का है ताना बाना .....बन्द मकान और बंद मॉल का है ज़माना .......क्या खिलवाड़ किया मानव ने प्रकृति केसाथ ....की मेरा प्यारा पंछी उड़ गया दूर दाराज ...इंसान को इसने सिखाया मिल जुलकर रेहने का तरीका .....और वातवरण कोशुद्धरखने का है इसमें सलीका .....मूक है यह पंछी पर है प्रकृति की आवाज़ ....इसको दयानपूर्वकसे सूनने सेहोगा मानव का कल्याड़ ........आज कहाँ चली गयी वह फुरफुराती चिड़िआ ....मेरी जानी पहचानी गौरैय्या ...लेखिका नमिता राय ........
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