Wednesday, September 23, 2020

शीर्षक

नजरिया अपना अपना

किसी को तिल मे ताड दिखा,किसी को समुन्दर मे बून्द का सार दिखा ।  
किसी को धरा की आपाधापी ,किसीको अम्बर का सुकून।
किसी को दर्द दवा लगे ,  किसी को मुस्कान  वीषाक्त
किसी को सजावट  कृतिम लगे,
और सादिगी सत्य सी साकार।
किसी  को शोरगुल मे तनहाई दिखे ,  किसी को तनहाई मे शहनाई।
किसी को सावन मे विरह दिखे, किसी को विरह  मे ऋँगार की ललाइ।
किसी को मौन मे शब्दो की झंकार  लगे ,              किसी को वाचालता मे मूक सी मोनता।
किसी को दर्पण
मे सत्य दिखे,और सत्य मे असत्य सी कृतिमता।
किसी को आरम्भ मे अँत   दिखे,    किसी को अँत   मे आरम्भ।
किसी को जीवन सँघर्ष लगे,  किसी को सँघर्ष मे आनन्द।
यह तो नजरिया है अपना अपना ,
जो लहरो मे  हलचल  लाये या 
तरँगो   मे गँम्भीरता।
वाद विवाद टकराव ,मिलाप बदलाव सामन्यजस्य ,ठहराव ,
यही तो  है जीवन की लय ताल ,
जिसपर हम मयूर सा थिरके,                         पडे बरसात की फुआर.
आओ नजरिया थोडा बदल कर देखे,
जीवन की खीँच  तान मे सुकून के एक दो पल को खीचेँ।
आमोद प्रमोद आनन्द,उल्लास,
 यह.सभी    उपस्थित हैं सुकून के उन पलो मे,  
जो दिखे अपने अपने नजरिये के पार।
जहां न क्रोध ,न आवेश ,न द्वेश न ईष्या ,बस एक  शीतल बयार,जो सुनाए मल्हार।
नजरिया अपना अपना बदल कर देखिये ।


नमिता राय